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दुर्ग जिला अस्पताल में सर्जरी के दौरान दो महिलाओं की मौत, दवा रिएक्शन की आशंका; स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप
छत्तीसगढ़ में नसबंदी ऑपरेशन के दौरान एक बार फिर मौत का साया मंडरा गया है।
दुर्ग जिला अस्पताल के मदर-चाइल्ड यूनिट (Mother & Child Unit) में शनिवार को नसबंदी और सिजेरियन सर्जरी के दौरान दो महिलाओं की मौत हो गई।
डॉक्टरों का कहना है कि दोनों की मौत दवा के रिएक्शन से हुई है।
यह हादसा न केवल स्थानीय स्तर पर सनसनी मचा रहा है, बल्कि 2014 के बिलासपुर नसबंदी कांड की भयावह यादें फिर से ताजा कर गया है — जब एक ही शिविर में 16 महिलाओं ने दम तोड़ा था और 100 से अधिक की जान खतरे में पड़ी थी।
⚕️ ऑपरेशन टेबल पर झटके, शरीर में अकड़न — फिर खामोशी
मरने वाली महिलाओं की पहचान पूजा यादव (27 वर्ष, बजरंग नगर) और किरण यादव (30 वर्ष, सिकोला भाटा) के रूप में हुई है।
दोनों शनिवार को नसबंदी प्रक्रिया के लिए भर्ती हुई थीं।
डॉक्टरों के मुताबिक —
“ऑपरेशन के दौरान अचानक दोनों मरीजों को झटके आने लगे, शरीर में अकड़न और सांस लेने में तकलीफ शुरू हो गई। ICU ले जाया गया, लेकिन दोनों की जान नहीं बच सकी।”
घटना के बाद परिजनों में कोहराम मच गया और अस्पताल प्रशासन में हड़कंप मच गया।
💊 ‘दवा रिएक्शन’ की आशंका, सभी इंजेक्शन जब्त
सिविल सर्जन डॉ. आशीषन मिंज ने बताया —
“दोनों मामलों में दवा रिएक्शन की आशंका है। ऑपरेशन के दौरान उपयोग की गई सभी दवाओं की जब्ती कर जांच शुरू कर दी गई है।”
सर्जरी में उपयोग हुई प्रमुख दवाएं थीं —
बुपीवाकेन, मिडान इंजेक्शन, और रिंगर लैक्टेट सॉल्यूशन।
सर्जरी करने वाली डॉ. उज्जवला देवांगन और एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. पूजा वर्मा ने भी रिएक्शन की संभावना जताई है।
शनिवार को कुल 9 महिलाओं की सर्जरी की गई थी, जिनमें से दो की मौत हो गई, जबकि बाकी 7 सुरक्षित बताई जा रही हैं।
🕯️ 2014 का बिलासपुर नसबंदी कांड — दर्द अब तक ज़िंदा
नवंबर 2014 में बिलासपुर जिले के तखतपुर ब्लॉक में आयोजित नसबंदी शिविर में
एक ही दिन में 83 महिलाओं की सर्जरी की गई थी।
इनमें से 16 महिलाओं की मौत हुई थी और 100 से अधिक गंभीर रूप से बीमार पाई गई थीं।
उस समय “सिप्रोसीन” नामक एंटीबायोटिक दवा को मौतों का कारण बताया गया था,
मगर 10 साल बाद भी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हो सकी।
अब दुर्ग की यह घटना फिर वही सवाल खड़े कर रही है —
“क्या हम 2014 से कुछ सीखे भी हैं या नहीं?”
⚠️ ‘महिला स्वास्थ्य सुरक्षा’ पर गहराया संकट
पूजा यादव ने हाल ही में गर्भपात कराया था और अब स्थायी गर्भनिरोध (Tubectomy) के लिए भर्ती हुई थीं।
वहीं, किरण यादव ने उसी दिन सुबह सिजेरियन डिलीवरी से बच्चे को जन्म दिया था और परिजनों की मांग पर उसी दौरान नसबंदी भी की गई थी।
शाम होते-होते किरण का शरीर अकड़ने लगा और कुछ ही मिनटों में उसकी सांसें थम गईं।
इन मौतों ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों की सुरक्षा प्रक्रियाओं, दवा गुणवत्ता, और मॉनिटरिंग सिस्टम पर गंभीर सवाल उठा दिए हैं।
🩺 स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई — जांच के आदेश, जवाबदेही पर दबाव
मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने सभी दवाओं के सैंपल जब्त कर जांच के आदेश दिए हैं।
अस्पताल प्रबंधन को घटनाओं की डिटेल रिपोर्ट शासन को भेजने के निर्देश मिले हैं।
राज्य स्तर पर भी इस मामले की फार्माकोलॉजिकल जांच कराई जा सकती है।
🔍 सवाल जो अभी बाकी हैं...
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क्या ऑपरेशन के दौरान दवा या उपकरण की गुणवत्ता परखने की प्रक्रिया का पालन हुआ था?
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क्या यह एक ही बैच की दवाओं का रिएक्शन है?
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क्या यह लापरवाही है या सिस्टम फेल्योर?
🕯️ “नसबंदी” शब्द का डर — फिर लौट आया
2014 की त्रासदी के बाद से ग्रामीण इलाकों की महिलाएं आज भी नसबंदी को लेकर डर महसूस करती हैं।
अब दुर्ग की यह घटना फिर वही “सरकारी नसबंदी = जोखिम” का भय जीवित कर गई है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल दो मौतें नहीं, बल्कि सिस्टम पर से भरोसे की दो सांसें कम होना है।
📌 मुख्य तथ्य एक नजर में
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स्थान: दुर्ग जिला अस्पताल, मदर-चाइल्ड यूनिट
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मृतक: पूजा यादव (27) और किरण यादव (30)
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संभावित कारण: दवा रिएक्शन
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डॉक्टर: डॉ. उज्जवला देवांगन, डॉ. पूजा वर्मा
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सिविल सर्जन: डॉ. आशीषन मिंज
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सर्जरी: कुल 9 (2 मौतें, 7 सुरक्षित)
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जांच: दवा सैंपल जब्त, रिपोर्ट प्रतीक्षित
⚖️ राज्य की साख पर सवाल
एक दशक बाद फिर उठी नसबंदी मौतों की गूंज ने स्वास्थ्य तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
सरकार के लिए यह केवल एक चिकित्सकीय त्रुटि नहीं, बल्कि जवाबदेही और विश्वास की परीक्षा है।
रिपोर्ट :- शेख सरफराज़ अहमद
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