धान खरीदी पर संकट के बादल: समितियों में तालाबंदी, कर्मचारी हड़ताल पर — सरकार का दावा “वैकल्पिक व्यवस्था तैयार”, हकीकत में ज़मीन पर ताला, किसानों में हताशा

 

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रायपुर/बिलासपुर/रायगढ़/सूरजपुर | Social Activity BSP

धान पक चुका है, किसान तैयार हैं — पर खरीदी की मशीनरी ठप पड़ी है। यह सिर्फ़ फसल का इंतज़ार नहीं, बल्कि व्यवस्था की परीक्षा भी है।
छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की शुरुआत 15 नवंबर से होनी है, मुख्यमंत्री ने ₹3,100 प्रति क्विंटल पर खरीदी का ऐलान भी कर दिया है। मगर ज़मीनी तस्वीर कुछ और ही बयान कर रही है — समितियों के ताले बंद हैं, कर्मचारी हड़ताल पर हैं, और किसान असमंजस में खड़े हैं।

सरकार का दावा है — “तैयारी पूरी है, वैकल्पिक व्यवस्था की जा रही है।” लेकिन खेतों से लेकर समितियों तक हकीकत यह है कि बारदाने की कमी, सॉफ्टवेयर ट्रायल अधूरे, और प्रबंधक–ऑपरेटरों की हड़ताल ने खरीदी की रूपरेखा को गहरा संकट बना दिया है।







हज़ारों कर्मचारी हड़ताल पर — चार सूत्रीय मांगों से अड़ा मोर्चा

राज्य भर में समितियों के प्रबंधक, कंप्यूटर ऑपरेटर, लेखापाल, चौकीदार और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी हड़ताल पर हैं।
इनकी प्रमुख मांगें हैं —

  1. सूखत राशि का भुगतान

  2. पुनरीक्षित वेतनमान

  3. सेवा नियम 2018 में संशोधन

  4. नियमितीकरण की प्रक्रिया

हज़ारों कर्मचारियों की यह हड़ताल खरीदी व्यवस्था को सीधे प्रभावित कर रही है। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है, “इतनी बड़ी वैकल्पिक व्यवस्था महज़ दस दिन में बनाना असंभव है।”


समितियों में तालाबंदी, फाइलें बंद दरवाज़ों के पीछे

प्रदेश के 2,739 खरीदी केंद्रों में से 2,000 से अधिक केंद्रों पर अब भी सॉफ्टवेयर इंस्टालेशन और ट्रायल रन अधूरे हैं।
बारदाने का हाल भी आधा-अधूरा है — ज़रूरत 25,000 गठानों की, पर पहुँचीं केवल साढ़े 12,000।
रायगढ़, बलौदाबाजार, कोरबा, सूरजपुर, मुंगेली और बिलासपुर जिलों में समितियों में तालाबंदी है, और धान तौलने की मशीनें तक जांच में नहीं लगी हैं।


17% नमी का खेल — और कर्मचारियों की दुर्दशा

धान खरीदी का सबसे विवादित पहलू है — 17% नमी पर खरीदी का नियम।
कर्मचारियों का कहना है कि धान के उठाव में देरी के कारण उसकी नमी घटकर 12–14% रह जाती है, जिससे वजन कम हो जाता है और “धान गबन” के आरोप में कर्मचारियों पर कार्रवाई होती है।

राज्य में 25 से अधिक कर्मचारी जेल में हैं, जबकि 500 से ज़्यादा कर्मचारी कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं।
इसीलिए इस बार सबसे बड़ी मांग है — धान का उठाव 72 घंटे के भीतर सुनिश्चित किया जाए।


सरकारी दावे बनाम ज़मीनी सच्चाई

सरकार का दावाजमीनी हकीकत
15 नवंबर से खरीदी शुरूसमितियाँ बंद, कर्मचारी हड़ताल पर
₹3,100 प्रति क्विंटल भुगतान तयपिछली खरीदी का भुगतान अब तक लंबित
बारदाने की पर्याप्त व्यवस्थाआधे केंद्रों में बारदाने नहीं पहुँचे
कॉल सेंटर से किसान को सुविधाकई केंद्रों में नेटवर्क तक नहीं
अवैध धान पर सख़्त कार्रवाईवैध खरीदी की तैयारी ही अधूरी

भंडारण और उठाव की उलझन

धान खरीदी का बफर सिस्टम कहता है — 5,000–7,500 क्विंटल धान की खरीदी के बाद ही उठाव संभव है।
लेकिन इस प्रक्रिया में 10 दिन तक देरी हो जाती है, जिससे नमी घटती है और नुकसान का ठीकरा कर्मचारियों पर फूटता है।
कई समितियों ने कहा, “धान सूख जाता है, किसान झुलसता है, और दोष हम पर मढ़ा जाता है।”


कलेक्टरों को आदेश, मैदान में ढिलाई

सहकारिता विभाग ने कलेक्टरों को वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने के निर्देश दिए हैं। आदेश है कि “अन्य विभागों के कर्मचारी खरीदी संचालन संभालें।”
लेकिन ज़िलों से मिल रही प्रतिक्रियाएँ कहती हैं — “प्रशिक्षण, तकनीकी ज्ञान और सॉफ्टवेयर सिस्टम की जानकारी के बिना यह व्यवस्था चलाना असंभव है।”


किसानों में बढ़ती बेचैनी

खेतों में धान तैयार है, पर समितियों के ताले अब भी बंद हैं।
किसानों का कहना है — “धान बेचने का वक्त आ गया है, मगर माप-तौल मशीनें तक नहीं चल रहीं।”
राज्य किसान सभा ने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह “धान खरीदी को केवल दिखावे का आयोजन बना रही है।”
किसान संगठनों ने चेतावनी दी है — अगर 15 नवंबर तक खरीदी शुरू नहीं हुई, तो राज्यव्यापी आंदोलन होगा।


मौसम की देरी, फसल की बेचैनी

इस साल मानसून की देरी और अक्टूबर की बारिश से फसल कटाई पहले ही 15–20 दिन पीछे चली गई है।
अब जबकि धान खेतों में तैयार है, किसान अपने उपार्जन को लेकर असमंजस में हैं।
कोरबा, पाली और पोड़ी-उपरोड़ा के किसान कहते हैं — “धान पक गया है, पर खरीदी केंद्रों के दरवाज़े अब भी बंद हैं।”


प्रशासन का दावा — “सब तैयार”, मगर सवाल बरकरार

जिला प्रशासन कह रहा है कि सभी केंद्रों में ट्रायल रन पूरा हो गया है, पर ज़मीनी रिपोर्ट कहती है —
बारदाने अधूरे, ऑपरेटर हड़ताल पर, डेटा एंट्री अधूरी।

सहकारिता विभाग के अधिकारी दावा करते हैं — “धान खरीदी में कोई दिक्कत नहीं होगी।”
लेकिन बड़ा सवाल यही है — जब सिस्टम चलाने वाले कर्मचारी ही मैदान में नहीं हैं, तो खरीदी कैसे चलेगी?


निष्कर्ष:
छत्तीसगढ़ की धान नीति इस वक्त दो मोर्चों पर परीक्षा दे रही है — सरकारी दावे और ज़मीनी सच्चाई।
किसानों की उम्मीदें तैयार खड़ी हैं, पर व्यवस्था अब भी इंतज़ार में।



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रिपोर्ट :- शेख सरफराज़ अहमद








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