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बिलासपुर | Social Activity BSP
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर रेल हादसे के बाद पूरा रेलवे तंत्र मानो एक “बलि का बकरा” तलाशने में जुट गया है। हादसे में जान गंवाने वाले लोको पायलट विद्या सागर अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन सिस्टम ने बिना देर किए उन पर ही पूरा दोष मढ़ दिया।
पुलिस ने रिकॉर्ड तेज़ी से गैर इरादतन हत्या (IPC 304A) का केस दर्ज किया — बिना यह सोचे कि असली दोष किसका है: एक मृत ड्राइवर का या फिर उस रेलवे सिस्टम का, जो हर साल 27 हजार करोड़ रुपए कमाकर भी अपने कर्मचारियों को सुरक्षा और तकनीक से वंचित रखता है?
🚨 76 किमी की रफ्तार, रेड सिग्नल और सेकंडों में मौत
4 नवंबर की दोपहर, बिलासपुर स्टेशन से कुछ किलोमीटर पहले गेवरा-बिलासपुर मेमू ट्रेन 76 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ रही थी।
रेलवे की प्रारंभिक रिपोर्ट में लिखा गया — “लोको पायलट ने रेड सिग्नल पार किया और ट्रेन मालगाड़ी से टकरा गई।”
बस, यही एक लाइन पूरे सिस्टम को क्लीन चिट देने का आधार बन गई।
लेकिन असलियत इससे कहीं गहरी है।
हादसे की जगह पर ट्रैक में तेज़ कर्व (घुमाव) था। हाल ही में इस सेक्शन में 2 की बजाय 4 लाइनें की गईं, और अब वहां 16 अलग-अलग सिग्नल लगे हैं।
एलआरएसए (लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन) ने पहले ही इस भ्रमित सिग्नल सिस्टम की शिकायत लिखित में दी थी, मगर फाइलें बस आगे बढ़ीं — समाधान नहीं।
⚙️ सिस्टम फेल, इंसान दोषी — यही है रेलवे की परंपरा
विद्या सागर को सिर्फ एक महीने पहले पैसेंजर ट्रेन की जिम्मेदारी दी गई थी।
वे पहले मालगाड़ी चलाते थे — यानी नई रूट और सिग्नल व्यवस्था की ट्रेनिंग नहीं मिली थी।
लेकिन हादसे के बाद सबसे पहला कदम क्या हुआ?
👉 “ड्राइवर के खिलाफ एफआईआर।”
रेलवे एक्ट और आईपीसी की धाराओं में एक मृत व्यक्ति को आरोपी बना देना शायद दुनिया की सबसे क्रूर नौकरशाही प्रक्रिया है।
फाइल में “मानव त्रुटि” लिखो और सिस्टम को बचा लो — यही पुरानी नीति है।
👩🔧 महिला असिस्टेंट लोको पायलट रश्मि राज — जिंदा सबूत, मगर अब जांच के घेरे में
इस हादसे में गंभीर रूप से घायल रश्मि राज, असिस्टेंट लोको पायलट, अब भी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही हैं।
फिर भी रेलवे प्रशासन ने उन्हें CRS (Commissioner of Railway Safety) जांच में तलब किया है।
वह प्रत्यक्षदर्शी हैं, मगर सिस्टम उनसे जवाब मांग रहा है — जबकि असली सवाल तो यह होना चाहिए था कि सुरक्षा इंतज़ाम क्या थे?
🚦 SPAD: हर हादसे का बहाना, असल में रेलवे की पुरानी बीमारी
हर बड़ी दुर्घटना के बाद एक ही शब्द सामने आता है — SPAD (Signal Passed At Danger)
यानी “ट्रेन ने लाल सिग्नल पार किया।”
पर क्या किसी ने यह पूछा कि सिग्नल दिखाई दिया भी या नहीं?
या फिर नई लाइन बिछने के बाद पुराना सिग्नल हटाया ही नहीं गया था?
बिलासपुर हादसे में भी यही हुआ — तकनीकी खामियां, भ्रमित सिग्नल और अधूरी मॉडर्नाइजेशन।
पर रिपोर्ट में दोषी सिर्फ एक नाम — “लोको पायलट।”
🧾 रेलवे जांच: 19 अधिकारी तलब, लेकिन जवाब कौन देगा?
CRS बृजेश कुमार मिश्र की टीम ने 19 अधिकारियों-कर्मचारियों को पूछताछ के लिए बुलाया है —
इनमें सिग्नल इंजीनियर, सेक्शन कंट्रोलर, स्टेशन मास्टर और घायल लोको पायलट तक शामिल हैं।
पूछताछ 6 और 7 नवंबर को DRM ऑफिस बिलासपुर में होगी।
लेकिन बड़ा सवाल वही —
क्या कभी किसी ज़ोनल मैनेजर या सिग्नल प्लानिंग विभाग की जिम्मेदारी तय होगी?
या फिर फिर से किसी लोको पायलट की डायरी से “क्लोजिंग नोट” निकालकर फाइल बंद कर दी जाएगी?
💰 रेलवे की कमाई अरबों में, मगर सुरक्षा भगवान भरोसे
बिलासपुर जोन भारतीय रेलवे के सबसे मुनाफे वाले जोनों में से एक है — सालाना 27,000 करोड़ रुपए की कमाई।
लेकिन लोको कैब में आज भी पुराने कंट्रोल स्विच, मैनुअल सिग्नल रीडिंग और फॉल्ट नोट करने के लिए नोटबुक ही हैं।
अब तक न ऑटोमेटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम, न कैब सिग्नल सिस्टम लागू हुआ है।
जब तक ये तकनीकी सुधार धरातल पर नहीं उतरेंगे,
तब तक हर बार कोई “विद्या सागर” मरेगा और सिस्टम बच निकलेगा।
❓ और आखिर में वही सवाल...
रेलवे के लिए यह हादसा शायद एक और फाइल भर हो,
पर देश के लिए यह सवाल अब भी ज़िंदा है —
“क्या हम हर बार उसी पैटर्न पर जांच चलाकर, उसी सिस्टम को क्लीन चिट देकर,
किसी और विद्या सागर की मौत का इंतज़ार कर रहे हैं?”
रिपोर्ट :- शेख सरफराज़ अहमद







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