Social Activity BSP
बिलासपुर, 25 फरवरी (Social Activity BSP)। छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में चर्चित ज्योति मिशन स्कूल यौन उत्पीड़न मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुख्य आरोपी फादर को उम्रकैद और दो महिला स्टाफ को 7-7 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है।
डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल शामिल थे, ने निचली अदालत के फैसले को त्रुटिपूर्ण करार देते हुए उसे निरस्त कर दिया और दोषियों को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
क्या था मामला
मामला कोरिया जिले के सरभोका स्थित स्कूल हॉस्टल का है। 9 सितंबर 2015 की रात चौथी कक्षा की 9 वर्षीय छात्रा के साथ दुष्कर्म की घटना हुई थी। पीड़िता के अनुसार, बाथरूम जाने के दौरान उसे चक्कर आए और बाद में कमरे में सोते समय आरोपी ने उसके साथ दुष्कर्म किया।
अगली सुबह जब छात्रा ने स्कूल की दो महिला स्टाफ से शिकायत की, तो मदद करने के बजाय उसे डांटा-फटकारा गया और घटना को छिपाने का दबाव बनाया गया।
फास्ट ट्रैक कोर्ट से बरी, हाईकोर्ट में पलटा फैसला
9 जनवरी 2017 को बैकुंठपुर की फास्ट ट्रैक अदालत ने तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। राज्य सरकार ने इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद पाया कि निचली अदालत ने पीड़िता के सुसंगत बयान और मेडिकल साक्ष्यों को तकनीकी आधार पर खारिज कर गंभीर त्रुटि की है।
मेडिकल और एफएसएल रिपोर्ट बने अहम साक्ष्य
अदालत ने डॉ. कलावती पटेल की मेडिकल रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि पीड़िता के निजी अंगों पर गंभीर चोट और सूजन की पुष्टि हुई थी। एफएसएल रिपोर्ट में भी पीड़िता के कपड़ों पर मानव शुक्राणु मिलने की पुष्टि हुई।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बलात्कार पीड़िता की सुसंगत और विश्वसनीय गवाही स्वयं में पर्याप्त साक्ष्य है और उसे स्वतंत्र गवाह से अनिवार्य रूप से पुष्ट करना आवश्यक नहीं।
दोषियों को सजा और सरेंडर के निर्देश
मुख्य आरोपी फादर जोसेफ धन्ना स्वामी को आईपीसी की धारा 376(2) और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई है।
वहीं, घटना की जानकारी छिपाने की दोषी पाई गईं दो महिला स्टाफ—फिलोमिना केरकेट्टा और किसमरिया—को आईपीसी की धारा 119 के तहत 7-7 वर्ष के कठोर कारावास और 5-5 हजार रुपये जुर्माने की सजा दी गई है।
अदालत ने निर्देश दिया है कि तीनों दोषी दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करें। निर्धारित समयसीमा में आत्मसमर्पण नहीं करने पर पुलिस गिरफ्तारी कर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करेगी।
यह फैसला न केवल पीड़िता को न्याय दिलाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि संवेदनशील मामलों में साक्ष्यों की अनदेखी को न्यायालय गंभीरता से लेता है।
रिपोर्ट :- शेख सरफराज़ अहमद
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