Social Activity BSP
बिलासपुर। शहर के लिंगियाडीह स्थित दुर्गानगर में मकान और दुकानों को तोड़ने की कार्रवाई अब केवल प्रशासनिक मामला नहीं रहा, बल्कि यह बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। आज इस संघर्ष को एक वर्ष पूरा हो गया है। महाआंदोलन की पहली बरसी पर प्रभावित परिवारों के साथ-साथ शहरभर की निगाहें छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के फैसले पर टिकी हुई हैं।
करीब 40-50 वर्षों से रह रहे 150 से अधिक परिवारों का आरोप है कि उन्हें बिना समुचित पुनर्वास के उजाड़ दिया गया। वहीं प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई अपोलो हॉस्पिटल रोड को 24 मीटर चौड़ा करने के मास्टर प्लान और न्यायालय में लंबित जनहित याचिका के निर्देशों के तहत की गई।
इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। विधायक अटल श्रीवास्तव ने विधानसभा में मामला उठाते हुए सरकार से सवाल किया कि कितने मकान तोड़े गए, कितनों का पुनर्वास हुआ और बाकी परिवारों के लिए क्या व्यवस्था है।
नगर निगम के अनुसार, शासकीय भूमि पर अतिक्रमण हटाने के लिए 206 मकान और दुकानों का सर्वे किया गया था। धारा 322/323 के तहत नोटिस देने के बाद 18 मीटर दायरे में अतिक्रमण हटाया गया। प्रशासन का दावा है कि सड़क संकरी होने के कारण मरीजों और आम लोगों को परेशानी हो रही थी, इसलिए यह कार्रवाई जरूरी थी।
हालांकि, सबसे बड़ा विवाद पुनर्वास को लेकर है। अब तक केवल 49 परिवारों को बहतराई में I.H.S.D.P योजना के तहत बसाया गया है, जबकि 113 परिवारों का पुनर्वास अभी भी प्रक्रिया में है। चौंकाने वाली बात यह भी है कि 47 परिवारों ने पट्टा के लिए प्रीमियम राशि जमा की, लेकिन उन्हें आज तक अधिकार पत्र नहीं मिला।
विपक्ष और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि यह कार्रवाई गरीबों के अधिकारों की अनदेखी है और बिना पूर्ण पुनर्वास के मकान तोड़ना अन्यायपूर्ण है। इसी के विरोध में बीते एक साल से लगातार धरना-प्रदर्शन और महाआंदोलन जारी है, जिसमें महिला संगठनों, समाजसेवी संस्थाओं और विभिन्न राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी रही है।
फिलहाल यह मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में विचाराधीन है, जहां दो प्रमुख याचिकाओं में कार्रवाई की वैधता और प्रभावितों के पुनर्वास को लेकर सुनवाई चल रही है।
🔍 बड़ा सवाल:
क्या यह सिर्फ अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई है, या फिर गरीबों के हक और अधिकारों की अनदेखी?
क्या बिना पट्टा दिए मकान तोड़ना न्यायसंगत कहा जा सकता है?
⏳ अब आगे क्या?
महाआंदोलन की पहली बरसी पर एक बार फिर उम्मीदें न्यायपालिका से जुड़ी हैं। हाई कोर्ट का फैसला न केवल इन परिवारों का भविष्य तय करेगा, बल्कि प्रदेश में ऐसे मामलों के लिए एक अहम मिसाल भी बनेगा।
✍️ निष्कर्ष:
लिंगियाडीह का यह मामला अब सड़क चौड़ीकरण बनाम अतिक्रमण से आगे बढ़कर मानवाधिकार, पुनर्वास नीति और प्रशासनिक संवेदनशीलता की परीक्षा बन गया है।
अब देखना होगा—क्या मिलेगा न्याय या जारी रहेगा संघर्ष… ⚖️
रिपोर्ट :- शेख सरफराज़ अहमद





.jpeg)

