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🏠 गरीबों के घर पर संकट, ‘सुशासन’ पर सवाल
प्रदेश में ‘सुशासन’ के दावों के बीच नगर निगम की कार्रवाई ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर निगम का अमला बस्तियों पर बुलडोजर चलाने की तैयारी में है, जिससे सैकड़ों परिवार बेघर हो सकते हैं।
विडंबना यह है कि सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों के क्षेत्र में ही गरीबों को अपने ही घर बचाने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है।
⚡ आंदोलन निर्णायक मोड़ पर, विपक्ष का एलान
आंदोलन के 129वें दिन धरना स्थल पर माहौल उस समय गरमा गया जब कांग्रेस पार्षदों और विपक्षी नेताओं ने इस संघर्ष को निर्णायक मोड़ तक ले जाने का ऐलान कर दिया।
विपक्ष का आरोप है कि निगम अधिकारी सत्ता के संरक्षण में तानाशाही रवैया अपना रहे हैं, लेकिन वे किसी भी कीमत पर गरीबों के सिर से छत नहीं छिनने देंगे।
❗ प्रशासन की नीयत पर गंभीर आरोप
स्थानीय निवासियों ने आरोप लगाया कि कुछ रसूखदार लोगों के इशारे पर प्रशासन बस्ती हटाने की साजिश कर रहा है।
आंदोलन में शामिल जनप्रतिनिधियों ने साफ कहा—
“एक तरफ सरकार पक्के मकान देने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ बसे-बसाए घरों को उजाड़ना समझ से परे है। अगर यह कार्रवाई नहीं रुकी, तो यह जनआक्रोश सरकार पर भारी पड़ेगा।”
👩👧👦 ‘मातृशक्ति’ का संघर्ष बना जनआंदोलन
यह आंदोलन अब केवल धरना नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। 129 दिनों तक लगातार डटे रहना प्रशासन की संवेदनहीनता को उजागर करता है।
महाधरना में सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों की भागीदारी ने इसे सर्वदलीय जनआंदोलन का रूप दे दिया है।
👥 प्रमुख रूप से शामिल लोग
आंदोलन में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग मौजूद रहे, जिनमें प्रमुख रूप से—
यशोदा पाटिल, सुखमति, लता देवांगन, पुष्पा देवांगन, राजकुमारी, साधना यादव, कल्पना यादव, सिद्धार्थ भारती, आदर्श सेवते, लखन कश्यप, लक्ष्मी लाल केवंट सहित सैकड़ों लोग शामिल हैं।
🔥 बढ़ता आक्रोश, प्रशासन मौन
लगातार 129 दिनों से चल रहे इस आंदोलन के बावजूद प्रशासन की चुप्पी और सत्ता पक्ष की अनदेखी ने लोगों के आक्रोश को और भड़का दिया है।
अब देखना होगा कि यह संघर्ष समाधान तक पहुंचता है या जनआक्रोश और उग्र रूप लेता है।
रिपोर्ट :- शेख सरफराज़ अहमद
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