Social Activity BSP
बिलासपुर/रायपुर (Social Activity BSP)। समाज में जरूरतमंदों तक मदद पहुँचाने की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सुकून फाउंडेशन छत्तीसगढ़ बिलासपुर लगातार ज़कात की रकम को उसके वास्तविक हक़दारों तक पहुँचाने का कार्य कर रहा है। संस्था का मानना है कि ज़कात कोई एहसान नहीं, बल्कि मुस्तहिक (हक़दार) का अधिकार है, जिसे तलाश कर उनके हाथों तक पहुँचाना हर सक्षम व्यक्ति की जिम्मेदारी है।
हाल ही में रायपुर के एक जरूरतमंद परिवार की दो वर्षों से चली आ रही परेशानी को सुकून की टीम ने दूर किया। परिवार आर्थिक तंगी के कारण अपने दो बच्चों की स्कूल फीस जमा करने में असमर्थ था। जानकारी के अनुसार, मदद के लिए उन्होंने राजधानी की अन्य बड़ी संस्थाओं से भी संपर्क किया, लेकिन उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाया। ऐसे में बिलासपुर से सक्रिय सुकून फाउंडेशन की टीम ने सत्यापन के बाद ज़कात की राशि से बच्चों की फीस अदा कर राहत पहुँचाई।
संस्था के संस्थापक शेख अब्दुल मान्नान ने कहा कि इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार, संपत्ति में से निर्धारित हिस्सा निकालकर उसे उसके हक़दार तक पहुँचाना फर्ज़ है। उन्होंने कुरान का हवाला देते हुए कहा कि समाज के सक्षम लोगों को चाहिए कि वे जरूरतमंदों की तलाश कर उनकी मदद करें, क्योंकि यह उनका अधिकार है, न कि दान।
डिजिटल और संपर्क आधारित कार्यप्रणाली के लिए पहचानी जाने वाली सुकून फाउंडेशन छत्तीसगढ़ बिलासपुर ने कई जरूरतमंदों तक समय पर सहायता पहुँचाई है। चाहे इलाज के लिए आर्थिक सहयोग हो, ब्लड की व्यवस्था हो या किसी आपदा की स्थिति—संस्था की टीम त्वरित सत्यापन के बाद मदद सुनिश्चित करती है। पंजाब में आई बाढ़ के दौरान अमृतसर से फिरोजपुर क्षेत्र तक राहत पहुँचाने का कार्य भी टीम द्वारा किया गया था।
रायपुर के इस परिवार का मामला यह सवाल भी खड़ा करता है कि जब शहर में बड़ी-बड़ी संस्थाएं शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का दावा करती हैं, तो फिर भी कुछ परिवार आर्थिक तंगी के कारण कर्ज लेने को क्यों मजबूर हो जाते हैं? निजी स्कूलों की बढ़ती फीस और आर्थिक दबाव के चलते कई परिवारों को सामाजिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
सुकून फाउंडेशन का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि समाज में जागरूकता लाना भी है—ताकि ज़कात सही हाथों तक पहुँचे और कोई भी जरूरतमंद अपने बच्चों की शिक्षा या इलाज के लिए दर-दर भटकने को मजबूर न हो।
रिपोर्ट :- शेख सरफराज़ अहमद


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