छेरकाबांधा के सैकड़ों किसानों का धान विक्रय अटका, विधायक अटल श्रीवास्तव के नेतृत्व में कलेक्टर को ज्ञापन — 31 अक्टूबर तक समाधान नहीं हुआ तो चक्काजाम की चेतावनी

बिलासपुर।

विकासखण्ड कोटा के ग्राम पंचायत छेरकाखांधा के लगभग 200 किसान इस बार धान विक्रय से वंचित रह गए हैं। गिरदावली (पंजीयन सूची) में नाम नहीं जुड़ने या सूची से कट जाने के कारण किसानों की मेहनत की कमाई अब मंडियों तक पहुँचने से पहले ही रुक गई है। खेतों में तैयार फसल खलिहान में पड़ी है, लेकिन शासन-प्रशासन की जटिल प्रक्रिया ने किसानों को आर्थिक संकट की कगार पर ला खड़ा किया है।

किसानों ने बताया कि उन्होंने हर साल की तरह इस बार भी धान की बुवाई कर पूरी मेहनत से फसल तैयार की, लेकिन जब वे पंजीयन केंद्र पहुँचे तो उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि “नाम सूची में नहीं है।” कई किसानों ने आरोप लगाया कि उनके नाम जानबूझकर हटाए गए हैं, जिससे अब वे समर्थन मूल्य पर धान बेचने के अधिकार से वंचित हो गए हैं।


इससे ग्रामीणों में आक्रोश और निराशा दोनों है। उनका कहना है कि यदि समय रहते गिरदावली सुधार नहीं किया गया, तो वे अपनी उपज बेच नहीं पाएंगे, जिससे केसीसी ऋण, खाद-बीज की खरीद और पारिवारिक खर्चों पर संकट गहराएगा।


स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कोटा विधायक अटल श्रीवास्तव के नेतृत्व में किसानों और ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों ने कलेक्टर बिलासपुर को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में स्पष्ट मांग की गई है कि छेरकाखांधा के किसानों के नाम तत्काल गिरदावली में जोड़े जाएं, ताकि वे नियमानुसार धान विक्रय कर सकें।


साथ ही ज्ञापन में चेतावनी दी गई है कि यदि 31 अक्टूबर 2025 तक किसानों के नाम सूची में नहीं जोड़े गए, तो रत्नपुर-कोटा मुख्य मार्ग पर चक्काजाम आंदोलन किया जाएगा।

ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों ने कहा कि अगर प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया, तो आंदोलन की सम्पूर्ण जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी। ज्ञापन की प्रति एसडीएम, तहसीलदार और थाना प्रभारी कोटा को भी भेजी गई है ताकि तत्काल कार्रवाई हो सके।



🔹 मुख्य बिंदु:

छेरकाबांधा ग्राम पंचायत के लगभग 200 किसान धान विक्रय से वंचित

गिरदावली सूची से नाम कटने के कारण संकट गहराया

31 अक्टूबर तक समाधान न होने पर चक्काजाम आंदोलन की चेतावनी

प्रशासन से तत्काल गिरदावली सुधार की मांग


🗣 किसानों की जुबानी:


> “हमने पूरे साल मेहनत कर फसल तैयार की, अब बेचने की बारी आई तो नाम काट दिया गया। अगर यही हाल रहा, तो हम खेती छोड़ने को मजबूर हो जाएंगे।” — एक प्रभावित किसान

यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि किस तरह एक छोटी सी त्रुटि या देरी किसानों की सालभर की मेहनत और आजीविका पर भारी पड़ सकती है।

अब नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन कब तक किसानों की इस पीड़ा का समाधान करता है।

Social Activity BSP

रिपोर्ट :- शेख सरफराज़ अहमद





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