Social Activity BSP
मुंबई (Social Activity BSP) : हिंदी सिनेमा में वॉर फिल्मों को लेकर एक तय फॉर्मूला रहा है—तेज बैकग्राउंड म्यूजिक, जोश से भरे नारे और ओवर-द-टॉप मेलोड्रामा। लेकिन 120 बहादुर इस पैटर्न को पूरी तरह तोड़ते हुए एक नई दिशा देती है। फरहान अख्तर इस फिल्म में मेजर शैतान सिंह भाटी की भूमिका निभाकर उस असाधारण कहानी को जीवंत करते हैं, जो रेजांग ला की बर्फीली पहाड़ियों में दबी रह गई थी। यह फिल्म देशभक्ति का शोर नहीं, बल्कि एक खामोश किंतु भयावह बलिदान की सच्ची गाथा दिखाती है।
कहानी — 120 बहादुरों का अदम्य साहस
1962 के भारत-चीन युद्ध में रेजांग ला दर्रे की रक्षा की जिम्मेदारी मेजर शैतान सिंह और 13 कुमाऊं रेजिमेंट के 120 जवानों के कंधों पर थी। जब 3000 से अधिक चीनी सैनिक आक्रमण के लिए बढ़े, तो हेडक्वॉर्टर ने पीछे हटने का आदेश दिया। लेकिन मेजर शैतान सिंह ने स्पष्ट कर दिया—रेजांग ला नहीं छोड़ा जाएगा। इसके बाद जो भीषण युद्ध हुआ, वह भारत की सैन्य इतिहास की सबसे वीरता भरी लड़ाइयों में से एक है।
फिल्म इस संघर्ष को बिना किसी अतिशयोक्ति के, वास्तविकता के साथ सामने रखती है।
फिल्म कैसी है?
120 बहादुर बिना किसी लंबी भूमिका या भारी-भरकम बैकस्टोरी में उलझे सीधे मुद्दे पर आती है। दर्शक शुरू से जानते हैं कि इन जवानों के सामने परिस्थितियाँ कठिन हैं और जीत की संभावना बेहद कम। इसके बावजूद उनका साहस और जज़्बा आपको भीतर तक झकझोर देता है।
पहला हाफ थोड़ा धीमा जरूर है, लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म अपनी पूरी रफ्तार पकड़ लेती है और एक-एक भावनात्मक और युद्ध दृश्यों का असर गहरा छोड़ती है। फिल्म की सबसे बड़ी सफलता यही है कि यह ‘लाउड’ हुए बिना भी दिल में उतर जाती है।
निर्देशन और लेखन
निर्देशक रजनीश घई ने फिल्म को जिंगोइज्म से दूर रखते हुए संवेदनशीलता और सटीकता के साथ पेश किया है। मेजर शैतान सिंह का महान चरित्र डायलॉग्स के जरिए नहीं, बल्कि उनके फैसलों, नेतृत्व और अपने सैनिकों के प्रति समर्पण से उभरकर आता है।
फिल्म के कई खामोश दृश्य बेहद प्रभावी हैं—ये सीन्स बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाते हैं।
एक्टिंग — फरहान अख्तर ने बाँधा असर
फरहान अख्तर ने मेजर शैतान सिंह की भूमिका में शानदार ईमानदारी और गहराई दिखाई है। उनकी परफॉर्मेंस पूरी फिल्म का केंद्र है।
विवान भटेना सेकंड-इन-कमांड के रूप में मजबूत छाप छोड़ते हैं। अंकित सिवाच और धनवीर सिंह समेत सभी कलाकारों ने अपने किरदारों में वास्तविकता घोल दी है।
राशि खन्ना अपने रोल में ठीक-ठाक हैं।
तकनीकी पक्ष — हर फ्रेम में दिखती है बारीकी
फिल्म के एक्शन दृश्यों में कोई अतिशयोक्ति नहीं है—ये वास्तविक और प्रभावशाली हैं।
सिनेमैटोग्राफी रेजांग ला की बर्फीली जमीन और सैनिकों की बेबसी को हर फ्रेम में महसूस कराती है।
मेकअप टीम का काम भी बेहद उत्कृष्ट है—फटे होंठ, थकान, धूल से भरे चेहरे… हर डिटेल युद्ध की कठोर परिस्थितियों को बयान करता है।
देखें या न देखें?
अगर आप एक सच्ची, संवेदनशील और शक्तिशाली वॉर फिल्म देखना चाहते हैं, जो चिल्लाती नहीं बल्कि सच बोलती है—120 बहादुर आपके लिए है।
फिल्म का सेकंड हाफ और क्लाइमेक्स अत्यंत भावनात्मक और प्रभावशाली है।
लेकिन अगर आप देशभक्ति के नारे और मेलोड्रामैटिक डायलॉग्स वाली ‘पारंपरिक वॉर फिल्म’ की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म आपको अलग लगेगी।
रिपोर्ट :- शेख सरफराज़ अहमद





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