Social Activity BSP
बिलासपुर, 12 फरवरी (Social Activity BSP)।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एंटी नक्सल अभियान में शामिल पुलिस जवानों की “आउट ऑफ टर्न प्रमोशन” से जुड़े विवाद पर अहम आदेश जारी किया है। न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू की एकलपीठ ने पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ताओं द्वारा लंबित प्रतिनिधित्व पर दो माह के भीतर कानून के अनुरूप निष्पक्ष निर्णय लिया जाए।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला दीपक कुमार नायक व अन्य बनाम राज्य शासन से संबंधित है। याचिकाकर्ता जवान 15-16 अप्रैल 2024 को कांकेर जिले के कालपर-हापाटोला-छेटेबेठिया क्षेत्र में बीएसएफ के साथ संयुक्त एंटी नक्सल ऑपरेशन में शामिल थे। इस अभियान में सुरक्षा बलों को बड़ी सफलता मिली थी, जिसमें 29 नक्सली मारे गए थे।
जवानों का दावा है कि इस बड़े ऑपरेशन में शामिल कुल 187 पुलिसकर्मियों में से केवल 54 को ही पुलिस विनियम 70(क) के तहत असाधारण पदोन्नति (Out of Turn Promotion) दी गई, जबकि अन्य जवानों को इससे वंचित रखा गया। उन्होंने इसे समानता के अधिकार और निष्पक्षता के सिद्धांत के विरुद्ध बताते हुए हाईकोर्ट की शरण ली।
कोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने सीधे पदोन्नति देने का आदेश नहीं दिया, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन करते हुए डीजीपी को निर्देशित किया कि वे प्रस्तुत अभ्यावेदन पर वस्तुनिष्ठ और पारदर्शी तरीके से विचार करें।
अदालत ने स्पष्ट किया कि—
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यदि याचिकाकर्ता नियमानुसार पात्र पाए जाते हैं,
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तो उन्हें भी पदोन्नति का लाभ प्रदान किया जाए।
क्या है कानूनी महत्व?
यह आदेश प्रशासनिक निष्पक्षता और समान अवसर के सिद्धांत को मजबूत करता है। अदालत ने संकेत दिया कि पदोन्नति जैसे संवेदनशील मामलों में पारदर्शिता और समान मानदंड अनिवार्य हैं।
अब सभी की निगाहें डीजीपी कार्यालय पर टिकी हैं, जहां आगामी दो महीनों में इस मामले पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। यह फैसला न केवल संबंधित जवानों के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि राज्य में एंटी नक्सल अभियानों में कार्यरत अन्य सुरक्षा बलों के मनोबल पर भी असर डाल सकता है।
रिपोर्ट :- शेख सरफराज़ अहमद
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