Social Activity BSP
बिलासपुर, 22 फरवरी। (Social Activity BSP)
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई वयस्क महिला अपनी सहमति से आरोपी के साथ जाती है और शारीरिक संबंध बनाती है, तो ऐसे मामले में अपहरण और दुष्कर्म का अपराध स्वतः सिद्ध नहीं होता। कोर्ट ने इस आधार पर विशेष न्यायालय द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।
क्या था मामला?
यह मामला जिला गरियाबंद के थाना इंदागांव में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। पीड़िता ने 14 जनवरी 2022 को रिपोर्ट दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि 11 जनवरी 2022 को आरोपी धर्मेंद्र कुमार उसे मोटरसाइकिल से अपने गांव ले गया और शादी का झूठा वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। बाद में आरोपी द्वारा यह कहे जाने पर कि वह अनुसूचित जाति से है और विवाह नहीं करेगा, पीड़िता ने शिकायत दर्ज कराई।
मामले में अपहरण, दुष्कर्म तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध दर्ज किया गया था। विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी अत्याचार), रायपुर ने 31 अगस्त 2023 को आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ राज्य शासन ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
मेडिकल रिपोर्ट और बयान ने बदली दिशा
सुनवाई के दौरान प्रस्तुत चिकित्सकीय रिपोर्ट में पीड़िता के शरीर पर किसी प्रकार की आंतरिक या बाहरी चोट के प्रमाण नहीं मिले। डॉक्टर के समक्ष दिए गए बयान में भी जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए जाने की पुष्टि नहीं हुई।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि पीड़िता और आरोपी के बीच प्रेम संबंध थे। पीड़िता स्वयं आरोपी के साथ गई थी और कई बार रात में उससे मिलने भी गई। अदालत में पीड़िता ने यह भी स्वीकार किया कि पुलिस द्वारा लिखी गई रिपोर्ट पर उसने केवल हस्ताक्षर किए थे और कुछ बयान पुलिस व परिजनों के कहने पर दिए गए थे।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है जब वह पूर्णतः अवैध या असंगत प्रतीत हो। अभियोजन पक्ष अपहरण और दुष्कर्म के आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब मुख्य अपराध सिद्ध नहीं हुआ, तो एससी-एसटी एक्ट के प्रावधान भी स्वतः लागू नहीं होते।
राज्य सरकार की अपील खारिज
इन सभी तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए आरोपी की बरी होने की स्थिति को यथावत रखा।
यह फैसला सहमति (कंसेंट) और आपराधिक मामलों में साक्ष्यों की अहमियत को रेखांकित करता है तथा यह दर्शाता है कि अदालतें केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस प्रमाणों के आधार पर ही निर्णय देती हैं।
रिपोर्ट :- शेख सरफराज़ अहमद
.jpg)




.jpeg)

