Social Activity BSP
बिलासपुर, 10 फरवरी (Social Activity BSP)।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोरबा जिले से जुड़े एक अहम संपत्ति विवाद में निचली अदालतों के आदेश को निरस्त करते हुए मुस्लिम कानून से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी कुल संपत्ति का एक तिहाई से अधिक हिस्सा वसीयत के जरिए नहीं दे सकता, जब तक कि सभी वैध वारिस इसकी स्पष्ट सहमति न दें।
यह फैसला जस्टिस बी.डी. गुरु की एकल पीठ ने सुनाया, जिसमें कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून का मूल उद्देश्य वारिसों के अधिकारों की रक्षा करना है, न कि उन्हें वसीयत के जरिए वंचित करना।
🔹 मामला क्या है?
कोरबा जिले की रहने वाली 64 वर्षीय जैबुननिशा ने अपने दिवंगत पति अब्दुल सत्तार लोधिया की संपत्ति में हक के लिए हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। उनके पति का निधन वर्ष 2004 में हुआ था। इसके बाद पति के भतीजे मोहम्मद सिकंदर ने एक वसीयत पेश करते हुए पूरी जायदाद पर दावा किया और खुद को ‘पालक पुत्र’ बताया।
जैबुननिशा ने इस वसीयत को फर्जी और उनकी सहमति के बिना बनाया गया दस्तावेज बताया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम कानून के तहत उन्हें संपत्ति में वैध हिस्सा मिलना चाहिए।
🔹 निचली अदालतों की गलती
इस मामले में निचली अदालतों ने 2015 और 2016 में जैबुननिशा की याचिका खारिज कर दी थी। निचली अदालतों ने वसीयत को सही मानते हुए विधवा को संपत्ति से वंचित कर दिया, जिसे हाईकोर्ट ने कानूनी भूल करार दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों ने गलत तरीके से वसीयत को गलत साबित करने का बोझ विधवा पर डाल दिया, जबकि वसीयत पेश करने वाले व्यक्ति पर यह जिम्मेदारी थी कि वह साबित करे कि सभी वैध वारिसों ने अपनी स्वतंत्र इच्छा से सहमति दी थी।
🔹 मुस्लिम कानून पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने मुस्लिम लॉ के सेक्शन 117 और 118 का हवाला देते हुए कहा कि:
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मुस्लिम व्यक्ति केवल एक तिहाई संपत्ति की ही वसीयत कर सकता है।
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एक तिहाई से अधिक संपत्ति की वसीयत तभी मान्य होगी, जब सभी वैध वारिसों की सहमति हो।
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सिर्फ चुप्पी या मुकदमा दायर करने में देरी को सहमति नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में कोई भी गवाह यह साबित नहीं कर सका कि जैबुननिशा ने पति की मौत के बाद पूरी संपत्ति वसीयत करने की इजाजत दी थी।
🔹 हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि भले ही वसीयत असली हो, तब भी सिकंदर संपत्ति का एक तिहाई से अधिक हिस्सा नहीं मांग सकता। कोर्ट ने दो टूक कहा कि मुस्लिम कानून में वारिसों के अधिकारों की रक्षा एक बुनियादी सिद्धांत है।
कोर्ट ने टिप्पणी की—
“कानूनी सीमा से अधिक की गई वसीयत, वारिसों की मृत्यु के बाद दी गई रजामंदी के बिना प्रभावी नहीं हो सकती।”
रिपोर्ट :- शेख सरफराज़ अहमद





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